सलमान खुर्शीद सार्वभौमिक शांति सद्भाव के प्रतीक: प्रो. नीलम महाजन सिंह

सलमान खुर्शीद: सार्वभौमिक शांति सद्भाव के प्रतीक 

प्रो. नीलम महाजन सिंह

सलमान खुर्शीद के साथ हाल ही में हुई एक मुलाक़ात में, मैंने उनकी मेज़ पर एक किताब देखी, 'सलमान खुर्शीद: ओवर द यीयर्स इन दी मीडिया'। नावेद खान ने डिजिटल खोज का मुश्किल कार्य किया, व 'एब्सोल्यूट फैक्टर' के राजेश प्रोथी ने सलमान खुर्शीद के लगभग तीन दशकों में लिखे इन लेखों को एक किताब का स्वरुप दिया। 
सलमान खुर्शीद कहते हैं, "मेरा जीवन कई चीज़ों का एक शानदार मेल रहा है—एक यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के तौर पर कानूनी विद्वत्ता, एक सार्वजनिक व्यक्ति (जिसे अक्सर 'राजनेता' के रूप में कम ही पसंद किया जाता है), ग्रामीण व छोटे शहरों के मतदाताओं से जुड़ाव, एक ज़मीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ता और एक तरह के सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में।"
सलमान खुर्शीद की लिखने की इच्छा हमेशा से ही बहुत प्रबल रही है; कुछ न कुछ हमेशा उन्हें कविता और कथा-साहित्य की ओर खींचता रहा है। उन्होंने 'आंसर एट डॉन' तब लिखी थी, जब वे सेंट स्टीफंस कॉलेज में इंग्लिश ऑनर्स की पढ़ाई कर रहे थे। 
उनके नाटक 'सन्स ऑफ बाबर' का मंचन टॉम ऑल्टर ने बहुत ही शानदार ढंग से किया था। 
सलमान खुर्शीद ने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें शामिल हैं: 'सनराइज़ ओवर अयोध्या: नेशनहुड इन अवर टाइम्स', 'कंटेस्टिंग डेमोक्रेटिक डेफिसिट: एन इनसाइड स्टोरी ऑफ 2024 इलेक्शंस' (मृत्युंजय सिंह यादव, सह-लेखक), 
'दी सिटिज़नशिप डिबेट: सी.ए.ए., एन.आर.सी. (CAA & NRC), 'एट होम इन इंडिया: दी मुस्लिम सागा', 'ट्रिपल तलाक़: एग्ज़ामिनिंग फेथ', 'बियॉन्ड टेररिज्म: न्यू होप फॉर कश्मीर', 'इंडियाज़ ट्रिस्ट विद द वर्ल्ड' (सलिल शेट्टी के साथ सह-लेखक),
'टेकिंग बेल सीरियसली', 'जुडिशियल रिव्यू: प्रोसेस, पावर्स एंड प्रॉब्लम', 'दी सुप्रीम कोर्ट एंड दी कॉन्स्टिट्यूशन', 'जस्टिस एट हार्ट: लाइफ जर्नी ऑफ जस्टिस वी. आर. कृष्णा अय्यर', 'दी अदर साइड ऑफ दी माउंटेन', 'दी फिलॉसफर प्रेसिडेंट स्पीक्स: सिलेक्टेड राइटिंग्स एंड स्पीचेस ऑफ डॉ. ज़ाकिर हुसैन' व और भी बहुत कुछ! मैंने 'सनराइज़ ओवर अयोध्या' की विस्तार से समीक्षा की थी, जो 9 नवंबर, 2019 को भारत के सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्मत फ़ैसले की व्याख्या करती है। 

सलमान खुर्शीद ने लिखा, "जैसे-जैसे हम पीछे मुड़कर देखते हैं, हम यह देख पाएँगे कि अयोध्या को लेकर वर्षों से चले आ रहे संघर्ष में हमने कितना कुछ खो दिया है। अगर मस्जिद का खोना आस्था का संरक्षण है, अगर मंदिर की स्थापना आस्था की मुक्ति है, तो हम सभी संविधान में आस्था का जश्न मनाने में शामिल हो सकते हैं। कभी-कभी, किसी को जगह देने के लिए एक कदम पीछे हटना, हमारी साझा मंज़िल की ओर कई कदम आगे बढ़ना होता है।" 
सलमान खुर्शीद गहन विचारक हैं, व उनकी कलम ने उनके विचारों को लेखों के रूप में उतारा है, जो भारतीय अख़बारों व वैश्विक प्रकाशनों में नियमित रूप से छपते रहते हैं। 'ओवर दी यियर्स इन मीडिया' की शुरुआत 21 फरवरी, 2003 को 'हिंदुस्तान टाइम्स' में प्रकाशित एक लेख 'देशभक्त बाँटने की कोशिश नहीं करते' (Patriots Don't Try To Divide) से होती है। इस किताब में संकलित आख़िरी लेख है 'जाति जनगणना, या एक ज़्यादा समावेशी भारत बनाने का आंदोलन', जो 25 मई, 2025 को 'नेशनल हेराल्ड' में प्रकाशित हुआ था। किताब में 370 पृष्ठ हैं, जो वाकई एक ज़बरदस्त प्रयास है। "प्रवीण तोगड़िया को ज़्यादा से ज़्यादा एक डरावना मसखरा कहा जा सकता है। लेकिन वह निश्चित रूप से खुद को बहुत गंभीरता से लेते हैं।" 2006 में, उन्होंने 'एच.टी.' में लिखा, "बीजेपी और एसपी, दोनों ही भारत के सबसे बड़े राज्य में जल्दबाज़ी वाले समाधान (quick-fixes) ढूँढ़ रहे हैं, और इसका नतीजा उन्हें भुगतना ही पड़ेगा।" 19 नवंबर, 2015 को, सलमान खुर्शीद ने 'दी वाॅयर' में लिखा कि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही अपनी ही पैदा की हुई दूरदृष्टि की कमी (myopia) के शिकार हैं। पूर्व विदेश मंत्री ने लिखा, "दोनों पड़ोसी देशों को अपनी संकीर्ण सोच को त्याग देना चाहिए और 'अभी और यहाँ' से आगे बढ़कर एक ऐसे भविष्य की ओर देखना चाहिए जिसे वे आपस में साझा कर सकें।" 27 अप्रैल, 2020 को उन्होंने लिखा, "भारत में समावेशी धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए आज भी जगह मौजूद है, लेकिन हम अपने लिए उस जगह को सुरक्षित नहीं रख पाएँगे, अगर हम यह विश्वास ही न करें—जैसा कि हमारे कुछ दोस्तों के साथ है—कि ऐसी कोई जगह है भी।" एन.डी.टी.वी. (NDTV) वेबसाइट - ब्लॉग पर, 3 मार्च 2021 को, खुर्शीद ने 'जी-23' यानी कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को एक खुला पत्र लिखा। उन्होंने 'दी प्रिंट' में लिखा कि भारतीयों के दिलों व दिमागों को जीतने की लड़ाई में कांग्रेस की भी एक भूमिका है। 'सनराइज़ ओवर अयोध्या' में सलमान खुर्शीद ने लिखा, "हिंदू राष्ट्र के मुद्दे पर बीजेपी को पता होना चाहिए कि उसका इरादा क्या है, लेकिन उसके नेता दुनिया भर में पहचान बनाने के लिए इस मुद्दे से बचते हैं।" 
भारत के सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील होने के नाते, उन्होंने ज़ोरदार अपील की कि अदालतों को हिंसा पर सख़्ती से रोक लगानी चाहिए। बहस व कानून की अवहेलना के बीच एक साफ़ लक्ष्मण रेखा खींची जानी चाहिए। 22 मार्च 2022 को, सलमान खुर्शीद ने 'दी वाॅयर' में लिखा कि हिजाब पर प्रतिबंध का फ़ैसला संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी करता है और 'समाज के अधिकार' का पक्ष लेता है। 10 जून 2024 को, उन्होंने इंडिया ब्लॉक (INDIA BLOC) के बारे में लिखा कि इसे एकजुट रहना चाहिए और अपनी जीतों को आगे बढ़ाना चाहिए। 
30 दिसंबर 2024 को, सलमान खुर्शीद का एक लेख कई अखबारों में छपा, जिसमें उन्होंने कहा, "मनमोहन सिंह का दौर भारत की अर्थव्यवस्था और समाज में बड़े बदलावों का एक दशक था। अगर अभी भी कुछ लोग सितारों को निहारने वाले बचे हैं, तो उन्हें आसमान में एक चमकता सितारा दिखाई देगा, जिसमें शालीनता, गरिमा, समर्पण, विद्वत्ता और राष्ट्रभक्ति जैसे गुण होंगे; उस सितारे का नाम है मनमोहन सिंह।" 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' के 4 जनवरी 2025 के अंक में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1968 के एक फ़ैसले को पलट दिया। जस्टिस सूर्यकांत के अल्पमत वाले फ़ैसले में इस बात को खास तौर पर उजागर किया गया था। 
सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े हर एक मुद्दे पर कार्य किया है। 3 अप्रैल 2025 को उन्होंने 'दी इंडियन एक्सप्रेस' में लिखा कि 'वक्फ़ संशोधन विधेयक' जीवन, जीने के उस तरीके के लिए एक ख़तरा था, जिसे कभी 'अनेकता में एकता' के रूप में सराहा जाता था। अपने अंतिम अध्याय में, सलमान खुर्शीद लिखते हैं, "जनगणना को एक केंद्रीय मुद्दा बनाकर, राहुल गांधी ने पार्टी का ध्यान फिर से सामाजिक समानता और समावेशिता की ओर मोड़ने का लक्ष्य रखा।" सलमान खुर्शीद विदेश मंत्रालय, अल्पसंख्यक मामलों, वाणिज्य, कानून व कंपनी अफेयर्स मंत्री रह चुके हैं। वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। ख़ुर्शीद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसकांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य हैं। 1991 तथा 2009 के आम चुनावों में फर्रुखाबाद लोकसभा क्षेत्र से वे विजयी चुने गए थे। 
उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत 1981 में प्रधानमंत्री कार्यालय में श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ 'ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी' के रूप में हुई थी। सलमान खुर्शीद के पास अंग्रेजी व कानून में अत्यंत प्रतिष्ठित डिग्रियां हैं, और भारत तथा इंग्लैंड से उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि सुदृढ़ रही है। 
वे अंग्रेजी में बी.ए. आनर्स सेंट स्टीफंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट हैं। ज्यूरिस्प्रूडेंस में LL.B.: सेंट एडमंड हॉल, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से उन्होंने प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बैचलर ऑफ सिविल लॉ (B.C.L.): M.A.: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय। ऑक्सफोर्ड में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने ट्रिनिटी कॉलेज में कानून के लेक्चरर के रूप में भी सेवाएं दीं, व वे सेंट एडमंड हॉल, ऑक्सफोर्ड के 'आनोरेरी फेलो' हैं।
सलमान खुर्शीद 2024 में 'इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर' के अध्यक्ष बने। उनका धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक और राजनीतिक दृष्टिकोण, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में सार्वभौमिक शांति और सद्भाव का प्रतीक है।

प्रो. नीलम महाजन सिंह
(वरिष्ठ पत्रकार, लेखिका, दूरदर्शन समाचार हस्ती, मानवाधिकार संरक्षण की सॉलिसिटर और परोपकारक)

singhnofficial@gmail.com

Comments