राजनीतिक जीवन: व्यक्तिगत प्रहारों की निंदनीय प्रवृति / प्रो. नीलम महाजन सिंह

राजनीतिक जीवन व्यक्तिगत प्रहारों की निंदनीय प्रवृति 

प्रो. नीलम महाजन सिंह 

यह तो सभी को मालूम है कि राजनीति अब साफ-सथरी नहीं है। अधिकतर प्रतिष्ठित लोगों को राजनीति में स्थान नहीं मिलता। महिलाओं का शोषण या अपराधीकरण कोई नई बात नहीं है। राजनेताओं द्वारा साम, दाम, दंड, भेद सभी हथकंडे अपनाये जाते हैं! फ़िर अचानक क्या हो गया जो, मार्च-अप्रैल 2026 तक, शिक्षाविद व सामाजिक कार्यकर्ता मधु पूर्णिमा किश्वर, जो कभी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की प्रबल समर्थक थीं, अब उनकी मुखर आलोचक बन गई हैं? उन्होंने नरेंद्र मोदी के 'निजी आचरण, कथित शिकारी जैसे व्यवहार व नीतिगत फैसलों' को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। किश्वर (76 वर्षीय) ने पीएम मोदी (75 वर्षीय) के समर्थन में एक किताब, 'मोदीनामा' लिखी थी। अब वे मोहभंग का दावा कर रहीं हैं। उनका आरोप है कि पीएम नरेंद्र मोदी किसी के दबाव में काम कर रहे हैं व हिंदू हितों के अवरोधक हैं। मधु के आरोपों के मुख्य पहलू क्या हैं? उन्होंने अचानक 360 डिग्री का यू-टर्न क्यों ले लिया है? किश्वर लगभग हर यूट्यूब चैनलों पर लंबे-लंबे इंटरव्यू दे रहीं हैं। पीएम मोदी की कट्टर समर्थक रहीं, किश्वर ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान, मोदी की तारीफ की थी; लेकिन जैसा कि वे खुद बताती हैं, उनके रुख में बदलाव "2014 में सत्ता संभालने के दिन से ही शुरू हो गया था। इसकी वजह उनका निजी मोहभंग था"। उन्होंने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से गंभीर आरोप लगाए हैं। बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मोदी को 'शिकारी प्रवृत्ति वाला व्यक्ति व सी.आई.ए. का एजेंट' बताया, जिसका मकसद हिंदू समाज को विकरित करना है। हे भगवान! मधु किश्वर, आपको क्या हो गया है? क्या यह 'अंगूर खट्टे हैं' (sour grapes) वाला मामला है? या फिर यह उस व्यक्ति से उचित सम्मान न मिलने की हताशा है, जिसकी आपने कभी पागलों की तरह तारीफ या चाटुकारिता की थी? X एक्स (Twitter) व फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर उनकी हालिया पोस्ट ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है। 'सच्चाई का ज़रूरी व गंभीर खुलासा होने तक' आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं। कुछ राजनीतिक विरोधियों ने उनके बयानों का इस्तेमाल, बीजेपी नेतृत्व की जांच की मांग करने के लिए किया है। पीएम नरेंद्र मोदी के समर्थक अक्सर उनके दावों को 'निजी व दुर्भावनापूर्ण हमले' कह कर खारिज कर रहे हैं। हालांकि, यह तो तय है कि किश्वर के इस अचानक भड़कने के पीछे उनके मोहभंग के पुख्ता सबूत मौजूद नहीं हैं। इसे बुजुर्ग होने पर मोहभंग की एक यात्रा के तौर पर भी देखा जा रहा है। मधु ने इस सफर की शुरुआत मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी में कैबिनेट के चयन व उनकी कार्यशैली को लेकर की थी। पत्रकार वसीम अकरम त्यागी के अनुसार, मधु किश्वर पीएम नरेंद्र मोदी पर सनसनीखेज़ आरोप लगा रहीं हैं। ऐसे आरोप लगाने के बावजूद, क्या इस महिला पर कोई कार्रवाई होगी? लखनऊ में 2 प्राथमिकियां (FIR) दर्ज हो गई हैं। यदि कोई शख्स पीएम मोदी पर अशोभनीय टिप्पणी करता है तो भाजपा शासित राज्यों की पुलिस उस शख्स को गिरफ़्तार कर जेल भेज देती है। डा. सुब्रमण्यम स्वामी व मधु किश्वर की नरेंद्र मोदी से संबंधित निजीता व टिप्पणियों में आम-जन को कोई रुचि नहीं है। इन पर भरोसा करके कीचड़ में लिथड़ना, मानव विवेक को गवारा नहीं है। मैं बिना किसी मैटीरियल के कुछ स्त्रियों (सांसद व मंत्री) को लांछित करने के अविश्वसनीय व मौक़ापरस्त लोगों के दावे के विस्तार का माध्यम नहीं बनना चाहती। दो बालिग़ लोगों की सहमति से बने संबंधों पर कटाक्ष करना उचित नहीं है।
पता यह करना है, मलाई अलग से मिलती है या तलवे पर लगाकर। मलाई खाई हो तो मत बोलो मधु किश्वर! अंजना व रुबिका लियाकत आती ही होंगीं बचाव में! सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर अंग्रेज़ी में धड़ाधड़ पोस्ट करते हुए मधु किश्वर ने मोदी के बारे में महिलाओं को लेकर जो टिप्पणियां की हैं वो सीधे 'चरित्र हनन व मानहानि' के दायरे में आती हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अलग-अलग संदर्भ-प्रसंग में आनंदीबेन पटेल, हरदीप पुरी, स्मृति ईरानी (मधु किश्वर ने उसे 12वीं पास कहा था), अमित मालवीय (इनके लिए 'पोर्न पैडलर', विशेषण इस्तेमाल किया है) मानसी सोनी व प्रदीप शर्मा का भी ज़िक्र किया है। उन्होंने मानसी सोनी से जुड़े मामले की विवादास्पद सीडी देखने का दावा किया है। उनकी टिप्पणी में 'भीमटे-मीमटे' जैसे शब्द आए हैं जो उनकी कट्टरपंथी घृणा, झल्लाहट व मानसिक असंतुलन का संकेत है। मधु किश्वर 2014 में नरेंद्र मोदी की कट्टर समर्थक के तौर पर अचानक राष्ट्रीय मीडिया में तेज़ी से उभरीं थीं। उससे पहले दिल्ली-मुंबई के एक्टिविस्ट सर्किल में उनकी पहचान, स्त्री मुक्ति के सवालों पर सक्रिय नारीवादी, सामाजिक कार्यकर्ता व महिलाओं के मुद्दों से जुड़ी पत्रिका ‘मानुषी’ की संपादक के तौर पर थी। ‘मोदीनामा’ लिखने वाली कट्टर समर्थक से मोदी की कट्टर आलोचक बन जाने व सार्वजनिक तौर पर इतना ज़हर उगलने के पीछे मधु किश्वर की अपनी महत्वाकांक्षाओं पर पानी फिर जाना, एक बड़ी वजह हो सकती है। ऐसी सोच व सत्ता का समर्थन करने वाली मधु किश्वर खुद को दूध का धुला साबित करने की कोशिश कर रहीं हैं, जबकि इससे वह खुद सवालों के घेरे में आ चुकी हैं। पीएम नरेंद्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के बाद, एक दशक से ज़्यादा के समय के दौरान मधु किश्वर की छवि निहायत अगंभीर, कट्टर, ज़हरीली सांप्रदायिक सोच वाली महिला की बनी है। उनकी साख शून्य के स्तर पर पहुंच चुकी है। मधु किश्वर ने अपनी टिप्पणी में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर जैसे आरोप लगाये हैं वैसे आरोप अगर विपक्ष के किसी नेता पर जड़े होते, तो बीजेपी व उसके संगठन, तमाम बुद्धिजीवी आसमान सिर पर उठाये होते। सारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ईरान-इज़रायल-अमेरिका की जंग छोड़कर, उसी पर चीख-चिल्ला रहा होता। फिलहाल इस मुद्दे पर सब जगह सन्नाटा है। सवाल यह भी है कि कि मधु किश्वर पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? सुब्रमण्यम स्वामी भी लंबे समय से मोदी के बारे में अनाप-शनाप बातें कहते आ रहे हैं लेकिन उन पर भी अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। कोई अन्य अगर इस तरह की बात कहीं लिख दे, या कह दे तो उसको सीधे जेल में डाल दिया जाएगा व सुप्रीम कोर्ट भी ज़मानत नहीं देगी। मधु किश्वर जो कह रही हैं, वह अगर सच है तो सबसे बड़ी अपराधी तो वे खुद हैं, जो किसी लालच में ऐसी सत्ता का अंधा समर्थन करती रहीं हैं। अगर अपने कहे को लेकर वे ईमानदार हैं तो प्रेस कान्फ्रेंस करें व सब सबूत सहित सामने रखें। ज़रा से विरोध करने पर सोशल मीडिया अकाउंट बंद करवाये जा रहे हैं व लोगों को जेल में डाला जाता है। लेकिन मधु या स्वामी के खिलाफ कुछ नहीं होता, तो यह अपने आप में सवाल खड़े करता है। लेखक अशोक कुमार पांडेय, का कहना है, "एपस्टीन फाइल का इंडियन वर्जन सामने आया है, सरेंडर जी की आत्मकथा लिखने वाली महिला ने अवतारी पुरुष को व्यभिचारी पुरुष बताया है। ये वो सच है, जिसे किताब में छुपा लिया गया था"। "हम क्या चाहते, अज़ादी! एपस्टीन गैंग से, आज़ादी," कन्हैया कुमार (कांग्रेस) का कहना है। अवसरवादी लोग किसी के सगे नहीं होते। वे सिर्फ़ 'अल-फ़ायदा ग्रुप' के सदस्य हैं। ऐसे लोगो से कोई सहानुभूति नहीं होनी चाहिये। सांप्रदायिक व्यक्ति किसी भी तरफ़ दिखे, वह समाज का दुश्मन ही होता है। क्यों मधु किश्वर जी? पीएम नरेंद्र मोदी की बायोग्राफी लिखने वाली महिला आपे से बाहर है। महिलाओं की सुरक्षा व सम्मान पर सवाल उठे हैं, पर इनका जवाब कोई नहीं होता। जब तक फायदा मिल रहा था, तब तक गुणगान करते रहो व महानतम बताते रहो। जैसे ही लाभ बंद हुआ या आगे कोई उम्मीद नहीं दिखाई दी तो उसी व्यक्ति का चरित्र हनन करो? ये सिर्फ मौका-परस्ती है, नैतिक पतन की पराकाष्ठा है, व भारतीय राजनीति में इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए। आप को नरेंद्र मोदी की नीतियाँ पसंद नहीं हैं तो आलोचना कीजिए। काम करने का तरीक़ा पसंद नहीं है तो सवाल उठाइए। उसमें महिला सांसदों को घसीटना निहायत ग़लत और निंदनीय है। विनोद कापड़ी (वरिष्ठ पत्रकार, फ़िल्मकार) के अनुसार सत्ता की ताकत के दंभ से दग्ध भाजपा ने खुद ही व्यक्तिगत व ओछे आरोपों की शुरुआत की।देश के पूर्व प्रधान मंत्री पंडित नेहरू पर भरी संसद में निशिकांत दुबे जैसों ने ओछे आरोप लगाए व पूरी सरकार, व लोकसभा अध्यक्ष सुनते रहे, तालियां बजाते रहे, हंसते रहे। मुझे द्रौपदी का चीरहरण याद आया जिसे देखकर कौरव अट्टहास कर रहे थे। अब फिर भाजपा की सुपरिचित लाडली, मधु किश्वर ने पीएम नरेंद्र मोदी व अन्य लोगों पर तमाम तरह के आरोप लगाए हैं। यकीनन किसी भी आरोप पर वो चाहे किसी के खिलाफ़त करें; पर यूं ही विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल तो खड़ा होगा ही, कि ऐसा क्यों हो रहा है कि यह सब खबरें भाजपा के भीतर से ही आ रही हैं? कांग्रेस की तारीफ करनी होगी कि पार्टी के किसी भी नेता ने मधु किश्वर के खुलासे के बाद कोई सतही टिप्पणी नहीं की है। सुब्रमण्यम स्वामी तो बोलते रहे हैं, किसी ने उनका क्या बिगड़ा। नेशनल हेरल्ड मामला चल ही रहा है या चलाया ही जा रहा है। लेकिन उनके बोलने का असर हुआ कि मधु किश्वर ने अपना अनुभव लिखा। अब शिक्षा मंत्री बनाने की बात हो तो आप कहिए कि मधु किश्वर व स्मृति ईरानी में कौन योग्य लगता है, कौन बना व इसके बाद सबूत का क्या करेंगें? अगर सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध तथ्यों का यह विवरण, विश्लेषण या प्रस्तुति व्यर्थ है तो कुछ किया नहीं जा सकता है। अगर आपके पास सुप्रीम कोर्ट का अच्छा वकील नहीं है, केंद्र के नेताओं के साथ अच्छे संबंध नहीं हैं, तो उस लंबे ट्वीट के साथ किसी भी लेवल पर इंगेजमेंट मत करिए। नोटिस आएगा, तो सम्हालते नहीं बनेगा। आरोप लगाने के बाद, ज़्यादा से ज़्यादा यही तो कहेंगी न, कि मेरे पास तथ्य व प्रमाण हैं। आपने कहा कि उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा है। आप ख़ुद ही सोचिए, कि जिसे ब्लैकमेल किया जा रहा है उसे दोषी मानना चाहिए या ब्लैकमेल करने वाले को। विक्टिम कौन है, अपराधी कौन? 
प्रो. नीलम महाजन सिंह 
(वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, अंतर्राष्ट्रीय सामयिक विशेषज्ञ, दूरदर्शन व्यक्तित्व, सॉलिसिटर फॉर ह्यूमन राइट्स संरक्षण व परोपकारक) 

singhnofficial@gmail.com

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