नीलम का मित्रों व परिवार के लिए हृदयस्पर्शी संदेश
प्यारे दोस्तों, यह मेरी तरफ से आपके लिए एक विनम्र संदेश है। इसे नकारात्मक विचार नहीं समझें। लेकिन हाँ, मन व भावनाएं भी आपकी परिस्थितियों के आधार पर बदलतीं रहती हैं। मैं 'दी प्रोफेट' से खलील जिब्रान द्वारा लिखित 'मृत्यु' पर उद्धरण कर रही हूं। 'तब अलमित्रा ने कहा, हम अब 'मृत्यु' के बारे में पूछें: व उसने कहा:
तुम मृत्यु का रहस्य जानना चाहते हो? लेकिन तुम इसे कैसे पाओगे जब तक तुम 'जीवन को दिल में नहीं खोजते'? रात की आकृति - दिन में, उल्लू - अंधा होता है, वह प्रकाश के रहस्य को उजागर नहीं कर पाता। वह दिन में कुछ नहीं देख सकता।
यदि तुम सच में आत्मा व मृत्यु को देखना चाहते हो तो अपने शरीर में, दिल को खोल दो, क्योंकि जीवन व मृत्यु एक ही हैं, जैसे नदी और समुद्र एक हैं।
मैंने अक्सर कहा है कि मेरी अधिकांश शारीरिक क्षमताएँ, क्रियान्वयन भगवान के चरणों में हैं।अत्याधिक खूबसूरती पर मुझे कभी घमंड नहीं हुआ। मैं सदेव वंचित व असहनीय परिस्थितयों में रहने वाले जन-मानस के साथ रही हूं। मैंने पहले भी बताया था कि मेरा स्वास्थ्य, कार्डियक समस्याएं (CVD) ब्लड प्रेशर, बाइपोलर डिप्रेशन, अनिद्रा, चिंता आदि के कारण से, मैं मैडिकल जांच के दायरे में हूं। ये सामान्य लक्षण लग सकते हैं, लेकिन इनका मेरी मनःस्थिति पर अप्रिय प्रभाव पड़ा है। मैं डॉ. अश्विनी मेहता, प्रेसिडेंट, धर्मबीरा हार्ट सेंटर व कार्डियोलॉजी विभाग, सर गंगा राम अस्पताल के गहन इलाज में हूं। मुझे ज़रूरतदायी मेडिकल इलाज मिल रहा है।
अपने जीवन में, मुझे तीन पुरुषों से आकर्षण व प्रेम हुआ। लगाव, प्रेम, सम्मोहन, हमेशा 'दर्द-ए-दिल' होता है। महात्मा बुद्ध ने कहा, 'लगाव दु:ख की ओर ले जाता है'। फिर भी जीवन में हम एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। जिस व्यक्ति से हम प्यार करते हैं, उससे अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर असहाय व दुःखी होते हैं। बस ऐसा ही नहीं करना चाहिए, चाहे जो भी हो। मैं निजीता व एकाकी जीवन जीती हूं। मैं अब किसी से अधिक उम्मीदें नहीं रखती। मैं अपनी ही एक 'छोटी सी दुनिया' में रहती हूं। उस में आप सभी का महत्वपूर्ण स्थान है। मैं उन लोगों के लिए कुछ करने का सपना देखती हूं, जिन्हें मेरी ज़रूरत है। उन लोगों के साथ अपना प्यार और भावनाएँ साझा करती हूं जो इससे वंचित हैं व लोगों की हर तरह से मदद करती हूं, जितनी मुझ में क्षमता है।
अगर मुझे कुछ हो जाता है या मैं जीवित नहीं रहती, तो आप सभी दु:खी नहीं होना। मृत्यु का दर्द समय के साथ कम हो जाता है और दुनिया आगे बढ़ती रहती है। हमने अपने कई प्रिय लोगों को इस दुनिया से जाते हुए देखा है और फिर भी हम सब ज़िंदा हैं ना?
11 साल की छोटी उम्र से ही जब मुझे 'दिव्य प्रकाश व निर्वाण दीक्षा' मिली, तो लोगों के लिए इसे समझना मुश्किल था। बेशक, मेरी माँ श्रीमती लज्जा देवी मेरे मन की स्थिति को पूरी तरह पहचानतीं थीं। किसी भी चीज़ ने मुझे आकर्षित नहीं किया, न दूसरों की दौलत, न सत्ता और न ही ताक़त! मैं पूरी तरह से अपने दम पर बनी हुई इंसान हूं। अपनी मेहनत से, दिन-रात कार्यरत, देर रात व जल्द सुबह पढ़ाई करके, यूनिवर्सिटी स्पेशल से सेंट स्टीफन कॉलेज जाकर, कम धन होने के बावजूद अपना 'रिसर्च' करके, व एल.एल.बी. की पढ़ाई कर, मैंने कड़ी मेहनत की। मेरी माँ ने मेरा बहुत साथ दिया। कई बार वह मेरे साथ परीक्षा केंद्र तक जाती थीं, शुरू से अंत तक मेरा इंतज़ार करतीं और हम इकट्ठे ऑटो में घर वापिस आते। धन्यवाद मेरी माँ, जो ईश्वरीय श्री चरणों में हैं। मेरी माँ की मृत्यु युवाकाल में ही कैंसर से हो गई थी। उस समय कैंसर का कोई इलाज नहीं था। मेरे पिता की मृत्यु कई वर्ष पूर्व मकर संक्रांति के दिन, एक 'हिट-एंड-रन' दुर्घटना में हो गई थी। माता-पिता को खोना मेरे लिए सदेव दर्दनाक व असहनीय रहा है। मैं उन्हें हर दिन याद करती हूं और उनकी कुछ सलाहों को न मानने के लिए उनसे क्षमाप्रार्थी हूं। मेरे पिता मेरी ताकत थे। ऐसे समय में जब महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्णा रुख था। महिलाओं को नज़रअंदाज़ किया जाता था। मेरे पिता श्री जसवंत राय जी ने मुझे पढ़ाई करने व आत्मनिर्भर बनने के लिए पूरा समर्थन दिया।
अगर मैं इस दुनिया से चली जाऊँ, तो आप दुःखी नहीं होना। बस यह याद रखना कि यहां एक ऐसी महिला अवतरित हुईं थी जो ज़िंदगी से परिपूर्ण रहीं। उसने मुस्कान के आवरण में हर व्यक्तिगत दुःख को छुपाया। असल में वह साहसी थीं, जिसने कानूनी रूप से शक्तिशाली लोगों को ध्वस्त किया। वह संवेदनशील, भावुक, प्यारी, देखभाल करने वालीं थीं, जो सभी को सकारात्मकता, आशा व साहस देतीं रहीं। आइए 'गूगल: इमेजिज़' पर खूबसूरत तस्वीरों के साथ मेरी ज़िंदगी का जश्न मनाएं। एक शिक्षाविद से लेकर 'मीडिया पर्सनैलिटी' तक के मेरे 35 साल के प्रोफेशनल सफर को सक्षम करें। मैं आपसे 'अलविदा' नहीं कह रही हूं, क्योंकि हमें अगले क्षण के बारे में नहीं मालूम। किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रहिए। जन्म-मृत्यु के बीच 'जीवन क्षणभंगुर' है।
'मैं हूँ गंगा' ('अन्तर्यात्रा' काव्य संग्रह: नीलम महाजन सिंह) की एक कविता:
मुझ पर है त्र्यंबकार वरदान, शिव की जटाओं से आई हूँ मैं, कौन रोकेग वेग को मेरे? वेग मेरा रूक नहीं सकता।
गंगा की गहराई में विरला ही कूदेगा? किनारे-किनारे गंगा घाट तट तक ही सिमित! 'हर हर गंगे' कहने वालो यह जान लो, कितना प्रदूषित किया है तुमने मुझे? फ़िर पूछते हो, गंगा प्रदूषित क्यों हो चुकी है? हाँ हाँ, यह सत्य है, बहुत प्रदूषित किया है मुझे पापियों और हत्यारों ने। परंतु प्रदुषित हो नहीं सकती मैं। मेरी पवित्रता की चिंता तुम मत करो। अपवित्र करने वालो, असक्षम हो तुम। ले जाओ मुझे भर-भर कर, अपनी पवित्रता के लिए, गंगाजली से, गंगा आचमन कर मानसिक शुद्धीकरण हेतु। अपवित्र हो नहीं सकती मैं, शिव की जटाओं से आई हूं मैं, धारा मेरी, धरा का अमृत है, कौन अपवित्र करेगा मुझे, त्र्यम्बकम् वरदान है मुझपर। मैं हूं गंगा, तुम्हारी जननी। शिव की अर्द्धांगिनी, नर में ईश्वर, नारी में ईश्वर, ईश्वर में नरेश्वर, नरेश्वर में परमेश्वर। मैं हूं गंगा, पृथ्वी के कोख से जन्मीं, शिव मेरे संरक्षक हैं। मैं हूँ गंगा, निर्मल, कोमल, सुन्दर। सत्यम् शिवम् सुन्दरम्।
नीलम महाजन सिंह
(वीरांगना, विचारक क्रांतिकारी कार्तिकेया, समाजवादी धरोहर, मानववाद-पुकारक)
singhnofficial@gmail.com
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